Gopal Ashka

गाँव मन पर गइल/ गोपाल अश्क

गाँव मन पर गइल
आँख बा भर गइल

ठाँव आपन गइल
किस्मतो जर गइल

ठन गइल रात मेँ
भोर तर-झर गइल

देखते - देखते
जिन्दगी मर गइल

भर नजर देख लीँ
'अश्क' बेघर भइल

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रूपकै सोचमा बिहानी भो

रूपकै सोचमा बिहानी भो
रात बित्यो फगत कहानी भो।

भावनाको सधैं गरेँ पूजा
भावनाकै कुरा खरानी भो।

जिन्दगी बाँच्ने थियो इच्छा
मृत्युकै रूप जिन्दगानी भो।

के सुनाऊँ कथा―व्यथा मनको

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जिन्दगी के बात पर जिन्दगी लुटाइने

जिन्दगी के बात पर जिन्दगी लुटाइने
हम इहाँ बहार के गीत गुनगुनाइने

रात-रात भर इहाँ हो रहल हिसाब बा
के जिती हिसाब से भोर के बताइने

का करी सुनाइ के मौत के गजल समय
हम त रोज मौत से आँख ही लडा़इने

'अश्क' से रहल कहाँ जाइ सुनके दरद
ऊ त आँख फोड़ ली हर घडी़ लजाइने

(बहरे हजज मुसम्मन अशतर मक्बूज)

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