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मैथिली

शासनके लोडहीतर लोक बनल कुच्चा छै/ धीरेन्द्र प्रेमर्षि

शासनके लोडहीतर लोक बनल कुच्चा छै
लोडहपर हाथ जकर अगबे सब लुच्चा छै

कहने छल जत्ते छै खधिया हम पाटि देब
वैषम्यक ठाढ मुदा पर्वत समुच्चा छै

वर्षा छै, कोशी आ बागमतीक बात छोडू

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जोरजुलुमसँ जे ने झुकए से भाले लगए पिअरगर यौ

जोरजुलुमसँ जे ने झुकए से भाले लगए पिअरगर यौ
इन्द्रधनुषी एहि दुनियामे लाले लगए पिअरगर यौ

ठोरे जँ सीयल रहतै तँ गुदुर–बुदुर की हेतै कपार!
एहन मुर्दा शान्तिसँ तँ बबाले लगए पिअरगर यौ

कुच्ची–कलमक रूप सुरेबगर रहलै, रहतै सबदिनमा
जखन अन्हरिया पसरल होइक, मशाले लगए पिअरगर यौ

खालि शब्दक जाल बुनल नहि चाही आब जवाब कोनो
नगर–डगरमे गुञ्जैत सबल सबाले लगए पिअरगर यौ

जुड़शीतलकेर भोरहरियामे धह–धह जरए कपार जखन
जलथपकी नहि, तखन जाँघपर ताले लगए पिअरगर यौ

माथा बन्हबैत कफन, उड़ाबए लाल गुलाल अकाशे जँ
हमरा तँ ओहि समय–सुन्दरीक गाले लगए पिअरगर यौ

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