गाँव मन पर गइल/ गोपाल अश्क

गाँव मन पर गइल
आँख बा भर गइल

ठाँव आपन गइल
किस्मतो जर गइल

ठन गइल रात मेँ
भोर तर-झर गइल

देखते - देखते
जिन्दगी मर गइल

भर नजर देख लीँ
'अश्क' बेघर भइल

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